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Monday, 13 November 2017

बच्चों से ही उज्जवल जग है



निर्मलता की निशानी बचपन
अल्हड़ता की कहानी बचपन
मुस्कान मधुर सुहानी बचपन
निष्कपट सी अज्ञानी बचपन.
बच्चो का होता कोमल मन
खुशियों से हँसता अंतर्मन
सरलता होती इमान-धरम
नहीं समझता पाप-पतन.
बाल-श्रमिक जीते शोषण में
मजबूर वे होते हैं जीवन में
भरके करुणा व्यथित नयन में
दर्द वे ढोते हैं जीवन में.
पूर्णतः ये बाते सच है
बचपन पर आई संकट है
उलझन में ही रहते सब है
भ्रमित वे होते भटकते पथ है.
प्यार मिले ,मिले प्रोत्साहन
हो सुन्दर पालन और पोषण
बच्चों में ही बसते रब हैं
बच्चों से ही उज्जवल जग है.   
        

Sunday, 29 October 2017

ऐ जाग जाग मन अज्ञानी



ऐ जाग जाग मन अज्ञानी
ये जग है माया की नगरी
अभिमान न कर खल-लोभ न कर
सब रह जायेगा यहीं पर धरी.
लघु जीवन है ये सोच जरा
सब मिथ्या है ये सत्य बड़ा
मत विचलित हो उत्साह बढा
कर कर्म वही गर्वों से भरी.ऐ ......
निज स्वप्न में डूबे मत रहना
ये मोह है रोग तू सच कहना
आनंद भरा जीवन पथ हो
गुजरे सुन्दर ये पल ये घडी.ऐ ......
अब क्या मांगू फैलाकर हाथ
विधि ने ही सजाया दिन और रात
रातें ये गुजर ही जाएगी
दिन निकलेगा किरणों से भरी.ऐ ........       

Sunday, 10 September 2017

हो श्रद्धा न हो आडम्बर



थे श्रेष्ठ सदा ही पिता हमारे
कर्तव्य निभाकर गए वो सारे
मन की व्यथा भरा नहीं था
टूट-टूटकर उर बिखरा था
भाई भी जग को छोड़ गये
अनंत पीर में डूबो गये
चीत्कार ह्रदय कर रहा निरंतर
स्मृति-हीन हुये ना पलभर
नयन-नीर बह उठता अक्सर  
समय ने दी सांत्वना बढ़कर
उॠण नहीं होगा ये जीवन
महसूस उन्हें करते हैं कण-कण
है भक्ति-भाव भरा अंतर्मन
तन-मन सारा करता वंदन
हो श्रद्धा ना हो आडम्बर
पत्र-पुष्प सुमन-दल लेकर
पार्वण-श्राद्ध करता है जो नर
पितृ-आशीष पाता जीवन-भर.     
      

Sunday, 30 July 2017

कवि तुम गीत लिखो कुछ ऐसा



कवि तुम गीत लिखो ऐसा
अक्षर-अक्षर मुखरित होकर
बोले प्रेम की भाषा , कवि तुम .......
कला वही सच्ची कहलाती
जिस चिंतन को चित्त अपनाती
उर-स्पंदन के जैसा , कवि तुम .......
जो झकझोरे भावुकता को
जागृत कर दे मानवता को
जो मनुज में भर दे आशा , कवि तुम .......
इंद्रधनुष सा मन हर्षा दे
युग-युग जलकर राह दिखा दे
उन दीपशिखा के जैसा , कवि तुम .........
मौन व्यथा की स्वर बन जाये
राग करुण बन नीर बहाये
दे व्याकुलता में दिलासा , कवि तुम .........
कुंठित मन को प्रेरित कर दे
नयी बोध नयी दृष्टि भर दे
भर दे नव अभिलाषा , कवि तुम .........